मुनि अष्टावक्र:
सनातन हिन्दू धर्म और परम्पराएं - 1 मुनि अष्टावक्र: यदि कोई व्यक्ति हिन्दू होने का गर्व करे तो इसे अभिमान या घमंड न समझा जाये, अगर उस व्यक्ति ने भगवद गीता का एक भी अध्याय अर्थ समझकर पढ़ा हो, या तो हमारे इतने उपनिषदों में से एक का, अंशमात्र भी अध्ययन किया हो। ऐसे गर्व करने का वह अधिकारी है, चाहे जन्म उसका किसी भी परिवार, कुल, गोत्र में हुआ हो । जैसे हिन्दू धर्म में सैंकड़ों देवी-देवता हैं (जो कि संज्ञात्मक हैं, हर एक दैवी प्रतिमा से हमको कोई न कोई गुण ग्रहण करना है, कुछ न कुछ शिक्षा लेनी है) ठीक वैसे ही हमारे पौराणिक इतिहासमें सैंकड़ों ऋषिमुनि, गुरु, आचार्यगण हो गए हैं जिन्होंने कुछ न कुछ ज्ञान मानव समुदाय को प्रदान किया है। ऐसे ही एक ज्ञानी-मुनि अष्टावक्र की बात हम आज करेंगे। नामके मुताबिक उनके शरीर के आठ अंग - हाथ, पाँव इत्यादि वक्र, यानि टेढ़ेमेढ़े थे, बेढंग थे। नाम तो उनके भौतिक शरीर को बाहर के रूप, रंग, आकार को देखकर दिया गया था, अंदर जो ज्ञान का भंडार था उससे इसका कोई लेना देना था नहीं। हम कहते हैं ना, कि कोई पढ़ा-लिखा पैदा नहीं होता, सब पैदा होने के बाद ही शिक्षा प्राप्त करत...